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Latest Kumar Vishwas New Poem/Kavita/Shayari/Poetry In Hindi Font

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Latest Kumar Vishwas New Poem/Kavita/Shayari/Poetry In Hindi Font

  तेरी ख़ुशरंग उदासी में...

तेरी ख़ुशरंग उदासी में जो सन्नाटा है....
मैं उसको अपने कहकहों से आ गुलज़ार करूँ....
तेरी ये शर्त कि बस एक बार मिलना हो....
मेरी ये जि़द है कि बस एक बार प्यार करूँ.....

इश्क़ मैंने किया पाक़ीज़ा इबादत की तरह....
और दुनिया ने मुझे समझा तिजारत की तरह...
मेरे अन्दर हूँ, मैं दुनिया से यूँ महफ़ूज़ मगर...
शोहरतें राह में लटकीं इबारत की तरह...

ख़ुद से मिलकर जो ज़माने की समझ जागी है....
अब ज़माने की ये मुश्किल है कि समझाए क्या...
वरना जो कुछ है किताबों में अगर वो ही करे....
आदमी मर ही न जाये तो क्या मर जाये क्या....

अपनी साँसों से बिछड़ सकता हूँ जानां लेकिन....
ग़ैर मुमकिन है कि अब तुझसे जुदा हो जाऊँ....
तू फरिश्तों की तरह हाथ उठाये रहना....
मैं तेरे इश्क़ में शायद कि ख़ुदा हो जाऊँ.....

Dr. Kumar Vishwas Poems
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गिरेबा चाक करना क्या है, सीना और मुश्किल है
हर इक पल मुस्कुराकर, अश्क पीना और मुश्किल है
किसी की बेवफाई ने हमें इतना सिखाया हैं
किसी के इश्क में मरने से पीना और मुश्किल है

Dr. Kumar Vishwas Poems
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तुम्हारे होने से किस-किस को आस क्या-क्या है

तुम्हारे होने से किस-किस को आस क्या-क्या है
तुम्हारी आम सी बातों में ख़ास क्या-क्या है
ये तुम ने हम को सिखाया है अपने होने से
भले वो कोई हो इन्सां के पास क्या-क्या है

एक पहाड़े सा मेरी उँगलियों पे ठहरा है
तेरी चुप्पी का सबब क्या है? इसे हल कर दे
ये फ़क़त लफ़्ज हैं तो रोक दे रस्ता इन का
और अगर सच है तो फिर बात मुकम्मल कर दे

मेरी आँखों से ये छाला नहीं जाता मौला
इनसे तो ख़्वाब भी पाला नहीं जाता मौला
बख़्श दे अब तो रिहाई मेरे अरमानों को
मुझ से ये दर्द संभाला नहीं जाता मौला

खेल एहसास के, इनाम में सिक्के औ हवस
आप ही खेलिए हम से नहीं खेले जाते
मुंबई तुझसे मुहब्बत तो है मुझको लेकिन
इस मुहब्बत के तक़ाज़े नहीं झेले जाते

Latest Kumar Vishwas New Poem/Kavita/Shayari/Poetry In Hindi Font


घर से निकला हूँ तो निकला है घर भी साथ मेरे

घर से निकला हूँ तो निकला है घर भी साथ मेरे
देखना ये है कि मंजि़ल पे कौन पहुँचेगा
मेरी क़श्ती में भँवर बाँध के दुनिया खुश है
दुनिया देखेगी कि साहिल पे कौन पहुँचेगा

जायचा देख के बोला ये नजूमी मुझ से
जो भी माँगा है वो हर हाल में मिल जाएगा
क्या मुबारक है नया साल जो मैं खुश होऊँ
वो जो बिछुड़ा है क्या इस साल में मिल जायेगा?

तेरी दुनिया, तेरी उम्मीद तुझे मिल जाए
चाँद! इस बार तेरी ईद तुझे मिल जाए
जिसकी यादों में चिराग़ों सा जला है शब-भर
उस सहर-रुख़ की कोई दीद तुझे मिल जाए

आँख की छत पे टहलते रहे काले साए
कोई पलकों में उजाले नहीं भरने आया
कितनी दीवाली गईं, कितने दशहरे बीते
इन मुंडेरों पे कोई दीप ना धरने आया

Dr. Kumar Vishwas Poems
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Muktak Ghazal Geet Kaveeta

अजब है क़ायदा दुनिया-ए-इश्क़ का मौला

अजब है क़ायदा दुनिया-ए-इश्क़ का मौला
फूल मुरझाये तब उस पर निखार आता है
अजीब बात है तबीयत ख़राब है जब से
मुझ को तुम पे कुछ ज्यादा प्यार आता है

माँ, बहन, बेटी या महबूब के साए से जुदा
एक लम्हा न हो, उम्मीद करता रहता हूँ
एक औरत है मेरी रूह में सदियों से दफन
हर सदा जिस की, मैं बस गीत करता रहता हूँ

एक-दो रोज़ में हर आँख ऊब जाती है
मुझ को मंज़िल नहीं, रस्ता समझने लगते हैं
जिन को हासिल नहीं वो जान देते रहते हैं
जिन को मिल जाऊँ वो सस्ता समझने लगते हैं

तूने तो तर्क़ किया ख़ुद ही त‘अल्लुक़ मुझ से
दिल मगर मेरा रखे तुझ से वास्ता क्यूँ है
तुझ को जाना है मुझे छोड़ के, मालूम है मुझे
तू रूठने के बहाने तलाशता क्यूँ है

Dr. Kumar Vishwas Poems
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Muktak Ghazal Geet Kaveeta


सारे गुलशन में तुझे ढूंढ के

सारे गुलशन में तुझे ढूंढ के मैं नाकारा
अब हर एक फूल को ख़ुद अपना पता देता हूँ
कितने चेहरों में झलक तेरी नजर आती है
कितनी आँखों को मैं बेबात जगा देता हूँ

एक दो दिन मे वो इक़रार कहाँ आएगा
हर सुबह एक ही अख़बार कहाँ आएगा
आज बाँधा है जो इनमें, तो बहल जाएंगे
रोज़ इन बाँहों का त्यौहार कहाँ आएगा

आप की दुनिया के बेरंग अंधेरों के लिए
रात भर जाग कर एक चाँद चुराया मैंने
रंग धुंधले हैं तो इनका भी सबब मैं ही हूँ
एक तस्वीर को इतना क्यूँ सजाया मैंने

ये महज पल है तो इक पल में ही टल जायेगा
और अगर जादू है तो आज भी चल जायेगा
मेरी मिट्टी का खिलौना मुझे वापस कर दो
जिस्म बच्चा है खिलौने से बहल जायेगा

Dr. Kumar Vishwas Poems
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अपने लफ़्जों से चुकाया है

अपने लफ़्जों से चुकाया है किराया इसका
दिलों के दरमियाँ यूँ मुफ़्त में नहीं रहती
साल दर साल मैं ही उम्र न देता इसको
तो जमाने में मोहब्बत जवाँ नहीं रहती

रास्ते ग़ुफ़्तगू के क्यूँ नहीं खोले जानां
आप भी चुप रहे हम भी नहीं बोले जानां
ख़्वाब का देखना इतना बड़ा गुनाह नहीं
ख़्वाब पलकों की तराज़ू पे क्यूँ तोले जानां

दिल में रहने के तक़ादे बहुत पुराने हैं
कुछ मकानों के किराये मगर चुकाने हैं
मैं इन्हें ख़ुद से अलग रक्खूँ तो कैसे रक्खूँ
इन थकानों के मेरे पाँवों में ठिकाने हैं

पास रुकता भी नहीं, दिल से गुज़रता भी नहीं
वैसे लम्हा कोई ज़ाया नहीं लगता मुझ को
गाँव छोड़ा था कभी और अब यादें छूटीं
अब कोई शहर पराया नहीं लगता मुझ को

MuktakGhazalGeetKaveeta
Dr. Kumar Vishwas Poems
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बात ऊँची थी

बात ऊँची थी मगर बात ज़रा कम आँकी
उस ने जज़्बात की औक़ात ज़रा कम आँकी
वो फरिश्ता मुझे कह कर ज़लील करता रहा
मैं हूँ इन्सान, मेरी ज़ात ज़रा कम आँकी

वो नज़ारे जो कभी शौक़-ए-तमन्ना थे मुझे
कर दिए एक नज़र मे ही पराये उसने
रंग-ए-दुनिया भी बस अब स्याह और सफ़ेद लगे
मेरी दुनिया से यूँ कुछ रंग चुराए उस ने

जिस्म का आख़िरी मेहमान बना बैठा हूँ
एक उम्मीद का उन्वान बना बैठा हूँ
वो कहाँ है ये हवाओं को भी मालूम है
एक मैं ही हूँ जो अनजान बना बैठा हूँ

तू अगर चाहे तो बर्बाद कर मुझे मौला
इस बहाने ही सही याद कर मुझे मौला
मैं थक गया हूँ इस किरदार को जीते-जीते
जिस्म की क़ैद से आज़ाद कर मुझे मौला

MuktakGhazalGeetKaveeta
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तेरी याद आती है


हर एक खोने हर एक पाने में तेरी याद आती है
नमक आँखों में घुल जाने में तेरी याद आती है
तेरी अमृत भरी लहरों को क्या मालूम गंगा माँ
समंदर पार वीराने में तेरी याद आती है

हर एक खाली पड़े आलिन्द तेरी याद आती है
सुबह के ख्वाब के मानिंद तेरी याद आती है
हेलो, हे, हाय! सुन के तो नहीं आती मगर हमसे
कोई कहता है जब “जय हिंद” तेरी याद आती है

कोई देखे जनम पत्री तो तेरी याद आती है
कोई व्रत रख ले सावित्री तो तेरी याद आती है
अचानक मुश्किलों में हाथ जोड़े आँख मूंदे जब
कोई गाता हो गायत्री तो तेरी याद आती है

सुझाये माँ जो मुहूर्त तो तेरी याद आती है
हँसे जब बुद्ध की मूरत तो तेरी याद आती है
कहीं डॉलर के पीछे छिप गए भारत के नोटों पर
दिखे गाँधी की जो सूरत तो तेरी याद आती है

अगर मौसम हो मनभावन तो तेरी याद आती है
झरे मेघों से गर सावन तो तेरी याद आती है
कहीं रहमान की जय हो को सुन कर गर्व के आंसू
करें आँखों को जब पावन तो तेरी याद आती है

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